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बारहवां पीरियड
आर्थिक मोर्चे पर जीवन में नीचा देखना पडे, तो इसके लिए आपकी दुविधा जिम्मेदार होती है। अनिश्चित मन से किए गए निर्णय जिम्मेदार होते हैं। दुविधा में आदमी जिंदगी में बडे़-बडे़ दांव लगाता है और कहता है कि जो होगा देखा जाएगा। इस दुविधा से बचे, तो बेडा़ पार है। ब्रोकर न तो आपकी निवेश की नाव का मांझी है, न ही पथप्रदर्शक। जाने-माने आर्थिक विश्लेषक कमल शर्मा कहते हैं, कि ब्रोकर को पॉयलट सीट पर मत बिठाइए। पॉयलट सीट खुद संभालिए। ब्रोकर न आपका दोस्त है, न दुश्मन। आप अपने आर्थिक लक्ष्य पूरे करने में उसकी मदद कितनी ले पाते हैं, यह आपकी योग्यता पर निर्भर है। केतन पारीख या हर्षद मेहता कोई नाम नहीं, उस तिकडमी मानसिकता के भूत-प्रेत हैं, जो लोगों की अनिश्चित और अनाप-शनाप लालच वाली मानसिकता का लाभ उठाते हैं। निवेश नैया उनकी डूबी, जो अपनी पूँजी और प्रतिभूतियों को ब्रोकर के हवाले करके खुद रेस्ट सीट पर लंबी तान कर सो गए।
एक होता है ब्रोकर और एक होता है सब-ब्रोकर। दोनों में फर्क यह है कि सब-ब्रोकर, ब्रोकर का स्थानीय एजेंट मात्र होता है जो सारी कार्यवाही ब्रोकर के बिहाफ पर करता है। जिस तरह शेयर बाजार और आपके बीच ब्रोकर एक मध्यस्थ है, उसी तरह ब्रोकर और आपके बीच सब-ब्रोकर एक पुल है। सब-ब्रोकर अपनी तरफ से कोई नियम-कानून-गारंटी-आश्वासन-शर्त आदि आप पर नहीं लागू करता। किसी भी लेन-देन, भुगतान, शेयर ट्रांसफर आदि की पूरी जिम्मेदारी ब्रोकर की ही होती है, सब-ब्रोकर की नहीं।
अगर कोई गड़बडी़ होती है, तो दावा निबटान के लिए दी गई छह माह की समय-सीमा के बाद आप अदालत की शरण में जा सकते हैं, जो एक थकाऊ और कष्टभरी प्रक्रिया है। शेयर बाजार में दावा निबटान की समय-सीमा चार माह है। ब्रोकर के खाते के अलावा किसी भी अन्य खाते से अगर आपने शेयरों या धन का कोई लेन-देन किया, तो उसका उत्तरदायी ब्रोकर नहीं ठहराया जा सकता। इसलिए हमेशा आपकी सारी कार्यवाही ब्रोकर के नाम से होनी चाहिए, न कि सब-ब्रोकर या किसी अन्य टाईप के एजेंट के नाम से।
निवेशक प्राय: टिप चाहते हैं, कि कौन सा शेयर कब खरीद लें, कब बेच दें। जैसा कि हमने पिछले एक पीरियड में बात की, कि अब सारे बडे ब्रोकर, कंपनियों के रूप में हैं, जिनके पास हर सेक्टर के स्पेश्लिस्ट शोध-विश्लेषकों की पूरी टीम होती है। देखिए कि ब्रोकर से आपके पास सलाहें किस तरह आती हैं। क्या यह केवल बाजार के रूख की सूचना है, कयास है, अन्दाजा है, अफवाह है, या इसके पीछे सटीक सूचनाओं पर आधारित पुख्ता होमवर्क करके राय तैयार की गई है?
100 में तकरीबन 90-95 सलाहें खरीदने की होती हैं या होल्ड रखने की। बेचने की सलाह बिरली ही होती है। इसलिए बेचने का फैसला बहुत बार आपका निजी होता है। प्राय: ब्रोकर यह जान भी नहीं पाता, कि उसकी ओर से आपको जो एसएमएस पर राय या इंटरनेट या डाक से रिपोर्ट मिली, उस पर आपने अमल किया भी या नहीं? अगर ब्रोकर को ही आपने अपना पोर्टफोलियो प्रबंधक भी बना रखा है, तब जिम्मेदारियां जुदा होती हैं। सेबी द्वारा निर्धारित सीमा के अनुसार पोर्टफोलियो मैनेजर, पांच लाख से बडे़ पोर्टफोलियो को ही मैनेज करते हैं और इस सेवा के लिए अलग से धनराशि लेते हैं। अब यह उनका दायित्व हो जाता है कि वे आपको पोर्टफोलियो को ऐसा मैनेज करें, कि वह बढ़ता जाए, बढ़ता जाए। लेकिन कई बार पोर्टफोलियो मैनेजर, अपने ग्राहकों को अंधेरे में रखकर उनके शेयरों की खरीद-फरोख्त करते देखे गए हैं।
ब्रोकर से मिलने वाली खरीद-फरोख्त की सलाहें, चाहे वे मुफ्त में मिलें, या इसके लिए आपसे पैसे लिए जाएं, सबके साथ डिस्क्लेमर जुडे होते हैं, कि सलाह पर अमल करने पर संभावित नुकसान के लिए आप किसी को जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते। दरअसल, आपको, आपके सैट-अप को, आपकी जोखिम-क्षमता, लक्ष्य औप सपनों को आपसे बेहतर कोई नहीं समझता। ब्रोकर की सलाह सामूहिक होती है, आप देखें कि वह आपको सूट करेगी या नहीं? आप कितना पैसा एक, दो या पांच साल के लिए लगाना चाहते हैं, किस सेक्टर में कितना एक्सपोजर और उसके अनुपात में किस फंड के कितने यूनिट अपने पोर्टफोलियो में रखते हुए कितना पैसा उच्च-जोखिम,उच्च-लाभ वाले शेयरों में लगाना चाहते हैं यह सब खुद तय करें।
ऐसी मानसिकता रखने के बाद ब्रोकर चुनने निकलिए, कभी धोखा नहीं होगा। अपनी और ब्रोकर की सीमाएं जानकर आप मैदान में उतरेंगे, तो ब्रोकर या उसके नाम पर कोई आदमी आपको थोथे वादों या सब्जबागों से बहला नहीं सकेगा। अगले पीरियड में हम ब्रोकर के बाते में कुछ और बात करने के लिए मिलेंगे। तब तक के लिए नमस्कार।
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