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शेयर खिलाडि़यों के लिए लीवरेजिंग दोधारी तलवार: डॉ. अशोक अग्रवाल |
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मुलाकात | द्वारा/by : मोलतोल संवाददाता | गुरुवार , 30 अप्रेल 2009 |
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वैश्विक स्तर पर पिछले डेढ़ साल में जो घटनाएं हुई हैं उनसे काफी महत्वपूर्ण सीख मिली हैं। इनमें सबसे अहम जोखिम का परसेप्शन और आकंलन हैं। निवेशकों के लिए सबसे बड़ी सीख यह रही कि लीवरेजिंग दोधारी तलवार है। जिन निवेशकों ने शेयर के ऊपर कर्ज ले रखा था उन्हें भी शायद यह बात समझ आ गई होगी कि लीवरेजिंग पोर्टफोलियों के लिए नुकसानदेह है और सबसे बड़ी सीख जो कभी अपनाई नहीं जाती वह यह है कि लालच अच्छा नहीं होता है। इंडेक्स के संदर्भ में देखें तो बाजार एक साल में पांच फीसदी के डेविएशन के साथ 2700-4200 के दायरे में रहेगा। यह कहना है एस्कार्टस सिक्युरिटीज लि., नई दिल्ली के हैड डॉ. अशोक अग्रवाल का। डॉ. अशोक अग्रवाल से मोलतोल संवाददाता ने शेयर बाजार से पिछले डेढ़ साल में मिली सीख और आम चुनाव के बाद के हालात पर बातचीत की। पेश है बातचीत के मुख्य अंश।
पिछले एक-डेढ़ साल के अनुभव से हमें क्या सीख लेनी चाहिए?
मैं समझता हूं कि पिछले डेढ़ साल में वैश्विक स्तर पर जो घटनाएं हुई हैं उनसे काफी महत्वपूर्ण सीख मिली हैं। इनमें सबसे अहम जोखिम का परसेप्शन और आकंलन हैं। वैश्विक वित्तीय संकट ने हमें रिस्क असेसटमेंट और मैनेजमेंट प्रोसेस की समीक्षा को मजबूर किया है। दूसरा, पूरे रेग्युलेटरी मैकेनिज्म और वैश्विक स्तर पर असर डालने वाली स्थितियों से निपटने की इसकी क्षमता भी जांच के घेरे में आ गई है। पहली बार यह बात महसूस की गई है कि बाजार की खुद को रेग्युलेट करने की क्षमता सवाल के घेरे में है। ग्लोबल फाइनेंस में ज्यादा जोखिम लेने की क्षमता भारी लीवरेजिंग और गैर-पारदर्शी अकाउंटिंग प्रैक्टिस के कारण आई है।
जहां तक निवेशक का सवाल है तो उनके लिए सबसे बड़ी सीख यह है कि लीवरेजिंग दोधारी तलवार है। मैं मानता हूं कि इस अवधि में उन लोगों ने सबसे ज्यादा नुकसान झेला है जिनकी एफ एंड ओ में ज्यादा पोजीशन थी। इसका एक कारण यह भी है कि इन लोगों ने पहले फायदा भी काफी कमाया था। जिन निवेशकों ने शेयर के ऊपर कर्ज ले रखा था उन्हें भी शायद यह बात समझ आ गई होगी कि लीवरेजिंग पोर्टफोलियों के लिए नुकसानदेह है और सबसे बड़ी सीख जो कभी अपनाई नहीं जाती वह यह है कि लालच अच्छा नहीं होता है। इस बात पर हम हर बार विचार करते हैं, फिर भी बार-बार गलती होती है। यही निवेश का विरोधाभास है।
अगर चुनाव के नतीजे के तौर पर बाजार के प्रतिकूल कॉम्बीनेशन बनता है तब भी क्या मौजूदा रैली जारी रहेगी?
इस सवाल का जवाब इस बात पर निर्भर करेगा कि बाजार के प्रतिकूल कॉम्बीनेशन किसे माना जा रहा है। लेफ्ट, मायावती, क्षेत्रीय दल या बड़ी संख्या में निर्दलीय, जो किसी भी गठबंधन को अस्थिर कर सकते हैं, को लेकर डर ठीक है। हालांकि, विभिन्न राजनीतिक रंग के नेताओं के अलग-अलग झुकाव या दिलचस्पी के बावजूद मार्केट ओरिएंटिड रिफॉर्म की प्रक्रिया अपरिवर्तनीय लगती है। वैश्विक आर्थिक संबंध भारत को उदारीकरण की प्रक्रिया को उलटने नहीं देंगे। इसलिए अगर बाजार प्रतिकूल गठजोड़ सत्ता में आता है तो रैली रुक सकती है। लेकिन अगर वैश्विक स्थितियां अनुकूल रहती हैं तो रैली में रुकावट अस्थाई होगी। इसके अलावा रैली अपने आप भी रुक सकती है क्योंकि यह बहुत तेजी से बढ़ी है, राजनीतिक गठबंधन सिर्फ रुकने का बहुप्रतीक्षित कारण बनेगा।
वर्तमान रैली के दौरान कई स्मॉल और मिडकैप शेयरों में 100 फीसदी तक का उछाल देखा गया है, क्या यह वैल्यू बाईंग है या सट्टेबाजी हो रही है?
यह वैल्यू बाईंग और सट्टेबाजी दोनों कारणों से हो रहा है। अधिकतर शेयरों में भारी गिरावट हुई है इसलिए कुछ बढ़त अपरिहार्य है कीमतों में वृद्धि आश्चर्यजनक नहीं है, मेरे हिसाब से जिस गति से कीमतें बढ़ी हैं वह आश्चर्यजनक है। अक्टूबर 2008 की तगड़ी गिरावट के बाद कुछ लोग ऐसी तेजी की उम्मीद कर रहे होंगे।
अगर आप पीछे मुड़कर देखें तो क्या ऐसा लगता है कि हमारे शेयर बाजार विदेशी संस्थागत निवेशकों पर बहुत ज्यादा निर्भर है?
एक निवेशक वर्ग के तौर पर एफआईआई हमारे बाजार में काफी अहम हैं। डिलीवरेजिंग के कारण हुई अनवाइंडिंग से पहले पिछले तीन-चार साल में देश में 29 अरब डॉलर का एफआईआई निवेश हुआ। यहां मैं जोड़ना चाहूंगा कि बाजार विदेशी निवेशकों पर निर्भर नहीं है बल्कि असेट्स की कीमतों में भारी वृद्धि के कारण भारी पूंजी की जरुरत थी वह चाहे घरेलू हो या विदेशी। भारत ही नहीं वैश्विक स्तर पर इक्विटी बाजारों में पिछले पांच सालों में जो तेजी देखी गई वह विदेशी पूंजी के कारण ही संभव हुई।
निवेश के प्रति आपकी एप्रोच क्या है? आप किसी खास शेयर या सैक्टर का चुनाव कैसे करते हैं?
टॉप डाउन और बॉटम अप दोनों अप्रोच अपनाता हूं। पहला मैं इक्विटी में लंबी अवधि के लिए निवेश करता हूं। इसका मतलब तीन से पांच साल की परंपरागत अवधि नहीं है। मेरे पास अभी ऐसे कई शेयर हैं जिन्हें मैंने 1990 के दशक की शुरुआत में खरीदे थे। दूसरा में लो डैट, अच्छा लाभांश, तेज आय वृद्धि, भविष्य में अच्छी आय और शेयर होल्डर फ्रैंडली मैनेजमेंट वाली कंपनी को पसंद करता हूं।
हाल के दिनों में मेल्ट डाउन के बाद निवेश एप्रोच में बदलाव होगा। अर्थव्यवस्था और सैक्टर का मेक्रो व्यू लेकर उस सैक्टर में सबसे अच्छी कंपनी को चुनना अब काफी नहीं होगा। निवेश विश्लेषण में अब इकॉनामिक साइकिल भी अहम हो गई है। मैनेजमेंट क्वॉलिटी और कॉर्पोरेट गवर्नेंस जैसे मुद्दे अर्निंग क्वॉलिटी और बैलेंसशीट की मजबूती की तरह ही अहम हो जाएंगे।
बाजार को लेकर आपका आउटलुक क्या है?
मुझे लगता है कि अभी वैश्विक अर्थव्यवस्था की दिक्कतें दूर नहीं हुई हैं। लेकिन क्रेडिट मार्केट की अनफ्रीजिंग, ग्लोबल फिस्कल स्टयूमलस पैकेज और अमरीकी टॉक्सिक असेट प्लान के कारण स्थिरता का भाव आया है। आर्थिक आंकडे़ अच्छे भी आ रहे हैं और बुरे भी, लेकिन वैश्विक रिकवरी में कुछ और समय लगेगा। बाजार में भारी उतार-चढ़ाव दर्शाते हैं कि आशावादी और निराशावादी दोनों धड़े अपने पक्ष में काफी मजबूत हैं। इस सब के बावजूद यह कहना होगा कि अपने समकक्षों की तुलना में भारतीय बाजार ग्रोथ प्रॉस्पेकट और वैल्यूएशन के लिहाज से बेहतर दिख रहे हैं। वैश्विक स्तर पर कोई पैनिक होने की स्थिति में बिकवाली हो सकती है लेकिन काफी धन निवेशित होने के इंतजार में है। बाजार को लेकर मेरा रवैया सकारात्मक लेकिन सावधानी भरा है। इंडेक्स के संदर्भ में देखें तो बाजार एक साल में पांच फीसदी के डेविएशन के साथ 2700-4200 के दायरे में रहेगा। यह दायरा कुछ बड़ा दिखता है लेकिन आप पिछले डेढ़ महीने में निफ्टी की चाल देखिए जो मार्च के 2525 से बढ़कर अप्रैल में 3515 तक चला गया। मतलब एक महीने में लगभग 40 फीसदी की वृद्धि।
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आखरी बार संपादन किया गया ( सोमवार , 15 मार्च 2010 )
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