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सरकारी कर्मचारी का किफायतनामा |
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खास फीचर | द्वारा/by : अविनाश वाचस्पति | शनिवार , 03 अक्टूबर 2009 |
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व्यंग्य
अभी सरकारी खर्चे में किफायत बरतने के सरकारी निर्देश जारी किए गए देर नहीं हुई है कि एक अजब सा आदेश सरकारी कर्मचारियों के सिर पर मंडराने लगा है। खुफिया और विश्वस्त कई बार खुफिया होते हैं और कई बार सिर्फ विश्वस्त लेकिन इस बार करेला और वो भी नीम चढ़ा, तो सूत्रों से पता चला है कि सरकारी कर्मचारियों पर एक आदेश की गाज अब गिरी कि तब गिरी। अब आप यह मत कहने लगना कि एक गाजर के गिरने से क्या तूफान आने वाला है। पर भाई मैं गाजर की नहीं गाज की बात कर रहा हूं जबकि गाजर से हल्का दिखलाई देने वाले इस शब्द में गजब के कयामती तेवर छिपे हुए हैं। गाजर गिरने से सरकारी कर्मचारियों की तो छोडि़ए आम आदमी का भी सिर्फ यही नुकसान होगा कि वो गाजर के हलवे से वंचित रह जाएगा इससे अधिक नुकसान तभी होगा जब सिर्फ एक गाजर न गिरकर पूरी गाड़ी भर गाजर किसी पर गिर पड़ेगी तो उसका बचाव तो गाजर भगवान भी नहीं कर सकता है।
तो किस्सा कोताह यह है कि सरकारी कर्मचारी अब अपने लंच यानी दोपहर के भोजन में किफायत बरतें। अब सब जानते हैं कि सरकारी कर्मचारी नाश्ता तो घर से ही करके चलते हैं चाहे वे 11 बजे ही क्यों न चलें और डिनर घर पर ही करते हैं चाहे 3 बजे ही घर के लिए आफिस से क्यों न वापिस निकल पड़ें। बहुत सारे खुशकिस्मत तो शाम की चाय का समोसे, पकौड़े के साथ लुत्फ भी घर पर ही लेते हैं। बस यही एक कमी है हम लोगों में कि दूसरे की खुशी हमसे बर्दाश्त नहीं होती। उसकी खुशी देखकर महसूसिए आप कि कितनों के सीने में चाय की जलन की फुरफुरी पैदा हो गई है। हमें इन सबसे उपर उठना होगा। नहीं तो नया आदेश हमें लंच का नहीं छोड़ेगा।
तो मैं लंच की बात कर रहा हूं कि आदेश लाया जा रहा है कि सरकारी कर्मचारियों के लंच का सेंसर किया जाने वाला है कि कहीं वे सब्जी में आलू, टमाटर, अरहर की दाल, घिया, सीताफल जैसी महंगी दाल-सब्जी का सेवन तो नहीं कर रहे हैं और अगर वे ऐसा करते पाए जाते हैं तो उन पर देशहित और जनहित में अपने खर्चों में किफायत न बरतने संबंधी कड़ी कार्रवाई की जा सकती है। इस आदेश के अमल में आने के बाद अगले चरण के तौर पर चाय में चीनी पर भी रोक लगाने के संबंध में विचार किया जा रहा है। महंगाई की तरह बढ़ती चीनी की कीमतों ने वैसे ही सबके सिर में दर्द नहीं कर रखा है।
इससे बचने के लिए कर्मचारियों के बीच चर्चा है कि वे कार्यालय परिसर में लंच न करके आफिस के सामने बने ढाबे में अपना लंच ले जाया करेंगे। बहुत सारे कर्मचारियों के बीच सरकारी के इस किफायती मगर उनके लिए तुगलकी आदेश के विरुद्ध आक्रोश पैदा हो गया है। वे कह रहे हैं कि हमारे उपर इस तरह नजर रखना गैर-कानूनी है। इस बीच कुछ कर्मचारियों ने तो मन बना लिया है कि वे सूचना अधिकार 2005 के तहत आवेदन डालेंगे और अपने उन वरिष्ठ अधिकारियों के लंच के मीनू की जानकारी मांगेंगे जो अपने अपने कक्षों में बैठकर भोजन करते हैं। वैसे अनधिकारिक तौर पर तो उन्हें उनके चपरासियों से अधिकारियों के खाने के मीनू की जानकारी मिल ही जाती है।
इस किफायत के संबंध में एक वाकया खासा प्रचलित है कि जब बस को पकड़ने के चक्कर में एक कर्मचारी बस के पीछे भागता हुआ ही अपने घर जा पहुंचा और अपनी पत्नी के आगे उसने 7 रुपये किराया बचाने की शेखी बघारी तो उसकी पत्नी ने उसको इस बात के लिए बहुत लताड़ा कि अगर वो टैक्सी के पीछे दौड़ कर घर आता तो 7 की बजाय 150 रुपये की किफायत होती।
लेखक हिंदी के जानेमाने व्यंगकार हैं।
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