| शेयर बाजार में होती है रकम कई गुना: जगदीश ठक्कर |
| मुलाकात | द्वारा/by : रजनीश कांत | सोमवार , 27 जुलाई 2009 | |
भारतीय शेयर बाजार की ताजा तेजी के बावजूद अभी भी इसके और ऊपर जाने की पूरी पूरी गुंजाइश है। निवेशकों को अब लॉर्ज कैप के बजाय मिड कैप और स्मॉल कैप की ऐसी कंपनियों में निवेश करना चाहिए जो रिटर्न देने के लिए काफी आकर्षक है। वे यह मानते हैं कि चीन डिकप्लड हो चुका है जबकि भारतीय बाजार को अभी इसमें वक्त लगेगा। यह मानना है फार्च्यून फिस्कल लि., बड़ौदा के निदेशक जगदीश ठक्कर का। जगदीश ठक्कर से मोलतोल संवाददाता रजनीश कांत ने बातचीत की। पेश है बातचीत के मुख्य अंश।शेयर बाजार से पहले दस लाख रुपए कमाने का सबसे आसान रास्ता निवेशकों के लिए क्या है? पहले शेयर बाजार के बगैर निवेश के लिए दस लाख रुपए कमाना सीखें, फिर इसको कई गुना करने के लिए शेयर बाजार में निवेशकों को आना चाहिए। मिड कैप्स एक बार फिर से निवेशकों के लिए आकर्षक बन गए हैं। क्या मिड कैप्स कंपनियों के शेयरों में निवेश करने में कोई जोखिम है? लार्ज कैप्स काफी लार्ज हो गए हैं और बहुत सारे मिड कैप, यहां तक कि स्मॉल कैप शेयर भी उतने ही आकर्षक बन गए हैं। तो क्यों नहीं कम कीमत वाले स्टॉक में निवेश करें जो कि अच्छा मुनाफा दे। आपकी नज़र में कौन-कौन से सैक्टर अच्छे हैं और किस सैक्टर में ज्यादा जोखिम है? मेटल, ऑटोमोबाइल्स, कैपिटल गुड्स, पावर, इंफ्रा, फार्मा, रियल्टी और टेक सैक्टर शॉर्ट टर्म में अच्छा कर सकते हैं जबकि बैंकिंग, ऑयल एवं गैस के साथ कुछ समस्या आ सकती है। सेंसेक्स का पीई मल्टीपल एक बार फिर 12 महीने की कमाई के करीब 17 गुना चल रहा है। आपकी राय में क्या यह भारतीय बाजार को खर्चीला बनाता है? नहीं, अभी नहीं। ऐतिहासिक रूप से जब पीई मल्टीपल 21 और 23 के बीच पहुंचता है तो ऊंचे स्तर पर कुछ मुनाफा वसूली होती है। पहली तिमाही के नतीजे को देखते हुए, अभी लांग पोजीशन लेने की पर्याप्त गुंजाइश है। बाजार के कुछ जानकारों को विश्वास है कि उभरते बाजारों और उनमें भारत में हाल में आई रैली, इस बात की तरफ इशारा करती है कि एफआईआई को भारत की ग्रोथ स्टोरी पर काफी भरोसा है। क्या भारत के संदर्भ डि-कपलिंग थ्योरी लागू होती है? यह सही है कि उभरते हुए बाजारों में शीर्ष तीन या चार देशों में भारत भी है, जिसने एफआईआई को काफी आकर्षित किया है, लेकिन डि-कपलिंग थ्योरी को आकार लेने में अभी काफी वक्त लगेगा। शायद चीन सफलतापूर्वक डी-कपल्ड हो चुका है। भारत में खपत काफी अधिक है और इस बात को कोई भी निवेशक चाहे वो घरेलू हो या विदेशी, नकार नहीं सकता है। जब शेष दुनिया संतृप्त हो चुकी है, भारत में अभी भी चीजों की काफी मांग है।
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| आखरी बार संपादन किया गया ( सोमवार , 15 मार्च 2010 ) | |